शनिवार, अक्तूबर 08, 2011

रावण उपदेश

रावण लीला की शब्दरचना के बाद
कल रात लंकापति स्वप्न में आये
अट्टाहस की जगह मंद मंद मुकुराये

बदला हुआ स्टाईल देखकर
हमारा चित्त भरमा गया
बोला कपिलमुनि इतना कष्ट कीजै
मेरी मूढ़मति की लघुशंका समाधान कीजै
इटली का नाश्ता कर चुके हों तो बोलें
हे मनमोहन यथाशीघ्र मौन व्रत खोलें
मंदोदरीपति ने अपना सुरक्षा आवरण हटाया
और हमें अपने दस मुख“र”जी का दर्शन कराया
बोले हे संजय तुम तटस्थ भाव रखते हो
सदैव मेरी उँगली करने में लगे रहते हो
इस कलयुग में सबकुछ मायावी है 
सारी दुनिया ही शूर्पनखा का भाई है
तुम्हारे दूरदर्शन ने जो धोती और टोपी दिखाई है
दरअसल हर किसी ने उसे मुझसे ही चुराई है
मैं मानता हूँ मेरा अमृत कुँड स्विस नाभि में जमा रखा है
और जन लोकपाल से शायद मेघनाथ वध लिखा है
अब आरटीआई से भला कौन सा बाली मर गया
लेकिन हाथ का आशीर्वाद उल्टा काम कर गया 
भस्मासुर वरदान पाकर उसी के पीछे लग गया 
सारी इंद्रनगरी अब उसी भस्मासुर से निपटने में लगी है
और मेरा वध करने की किसी को फुर्सत ही कहाँ पड़ी है
लेकिन तुझे राज की बात बता रहा हूँ
अपने ही मौत का सामान सौंप रहा हूँ
मेरी नाभि का अमृत कुँड कोई सरदार नहीं खोज पायेगा 
खुद के भीतर झाँको तुम सबमें एक रावण मिल जायेगा ...  जय हो !

5 टिप्‍पणियां:

  1. अत्यंत चिंतन से गढ़ी गई रचना....... परन्तु आपने कहा है तो कहे देता हूँ ......... "सरदार नहीं खोज पायेगा" ये टिप्पणी साधारण बोल चाल के लिहाज से ठीक है परन्तु कविता में पिरोना मेरे विचार से ठीक नहीं........दूसरा इतनी बौद्धिक रचना में "सदैव मेरी उँगली करने में लगे रहते हो" लाइन हलकी लगती है....... क्षमा कीजियेगा....

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  3. अब राजनैतिक लीलाओं के सामने..रावण की लीला में ज्यादा नैतिकता और आदर्श दिखता है,,अन्दर रावण मिले तो भी बेहतर होगा...बजाय नेता के गुण मिलने के ....बहुत रोचक और सामायिक रचना

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