रविवार, जून 26, 2011

मैंने ही माखन खायो

सोलह अगस्त से हजारे अन्ना फिर त्यागेंगे अन्न !
सुनकर रजिया का कुनबाहो गया है सन्न!!

पिग्गी राजाहो गये इस भय चिंता में लीन !
पिघल ना जाये मेरे बाबा अमूलकी आईसक्रीम!!

आ गई फिर बेवजह मुसीबत की घड़ी !
हो न जाये अब की अपनी खटिया ही खड़ी!!

कुटिल मुनि” के मानस पटल पर एक ही सवाल!
कैसे बचेगी अब की दफा अपनी मोटी खाल!!

जनमर्दन” भी अबकी प्रेस से क्या बोलेंगे!
सिर मुँडाते ही जब उनके ओले पड़ेंगे!!

चिब्बू बोले सल्लुसे सुन भाई खुर्शी!
कुछ तो बता कैसे बचेगी अपनी कुर्सी!!

सल्लुबोले पिन्चू जाने हमें काहे का गम!
आपके तो नाम मे ही लिखा हुआ पी--रम!!

पिंचू दादा बड़े सयाने मन ही मन ये ठाना है!
अब कुछ भी हो जाये ये मोहनको ही ढोना है!!

कह दूँगा मैय्या से मुझको अब बस माफ करो !
बुढ़ापे में मुझसे भी थोड़ा सा इंसाफ करो!!

देख कुटिलता के चक्रव्हयू को मोहनका सर चकरायो !
बोला “सोनी” माता से मैय्या मोरी मैं नहीं माखन खायो !!

बार बार दोहराता हूँ ये बात समझ नहीं आयो !
ओ सुन मैय्या मोरी मैं कब माखन खायो!!

माता बोली सुन मेरे मोहन सारे अपयश का भार तुझे ही ढोना है !
तुने ही सब माखन खाया सबसे अब ये कहना है!!

परदेशी माँ की पीड़ा को मोहन झेल न पायो !
थक हार कर मोहन बोले हाँ मैय्या मोरी मैने ही माखन खायो !!

अंतर्मन की पीड़ा को मोहन “काफिर” से दियो बताय !
ऐसी अम्मा अब फिर कोई दुश्मन भी ना पाय !!

1 टिप्पणी:

  1. .

    आज सियासत खेल हो गया, खेल रहे सब लोग
    क्या रजिया का कुनबा, क्या जोगी का जोग
    अंतर्मन को करे खोखला ये सिस्टम का कीड़ा
    शुक्र है कलयुग में मोहन ने समझी माँ की पीड़ा
    किसका करें भरोसा, क्या सजनी क्या सैया
    दुनिया की ये रीत हो गई, छोड़ो संजू भैया !

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